satishthokade_humtum01

अभी अभी जब बातें करते थे हम तुम, ज़रा सी आँख लगी और मैने तुम्हे देखा..

नही ऐसा नही की बता सकूँ मैं ज़्यादा कुछ मगर, ज़रा अलग सा था  सपना तो ज़िक्र कर बैठा..

हन तुम ही थी वो वक़्त के साथ और निखरी हुई सी, ज़रा सी मोटी और उम्र की रेखाओं से लदी हुई सी

ना जाने कैसे तुमने  साड़ी वो पहनी हुई थी, यकीन अब तक नही के साड़ियाँ कब से पहन ना शुरू की.

कहा ना तुम ही थी वो मेरे घर के सोफे पर, बैठ कर देखती थी कुछ तो टीवी पर.

पावं की एडियाँ कुछ फट गयी थी शायद या फिर यूँ ही मलहम लगा रही थी तुम उन पर.

तुम ही तो थी पूनम के चाँद के जैसे खिली हुई सी, और झलक रही थी चैन चश्मे से लटकती..

तुम्हारे साथ बैठी बिल्ली भी तुम्हारी दिख रही थी जो खाती थी दूध में डूबी रोटी..

माँ को भी देखा मैने साथ की कुर्सी पर बैठे, वो अब तक शायद तुम्हे कुछ समझा रही थी.

और तभी अंजाना सा कोई आदमी नज़र आया, और वो तुम्हे  माँ कह के बुला रहा था..

एक औरत जो तुमसे कहीं छोटी थी, मंदिर वाले कमरे से निकल कर आ रही थी..

पाओं छु कर तुम्हारे और माँ के, वो शायद फिर रसोई घर की तरफ जा रही थी.

मैं वहाँ मूक खड़ा ही रहा दरवाज़े पर के तभी गाड़ी का हॉर्न बाज़ उठा, मैं चल दिया..

मैं भी तो मैं नही दिखता था बिल्कुल, थोड़ा और मोटा सा लग रहा था, बॉल भी कुछ सफेद से ही थे…

हन मगर तुम बहोत ही खूबसूरत लग रही थी, फोन पर शायद बात किसी बेटी से कर रही थी,

हाथ हिला दिया तुमने मुझे यूँ देख कर, अपने घर में तल्लीन लग रही थी..

और मैं ख़ास कर तुम्हे बुलाता ही रहा जब, आ के चुपके से तुमने रुमाल दे दिया..

हमेशा की तरह शायद मुझे यही लगा,  अब रुमाल ही तरीका है हमारी मोहब्बत का.

और जागना ही बेहतर लगा मुझको, अपने सपने को हक़ीकत में जीने के लिए

मर तो कोई भी सकता है चाहत सीने में लिए, इश्क़ होना चाहिए उम्र भर साथ चलने के लिए

Advertisements